डूबते सूरज का तबस्सुम

  अर्श-ए-सिफ़र से शनासाई थी मेरी... लेकिन आज डूबते सूरज का तबस्सुम देखा। मुरझाते फूल को हसते देखा। और तनहा पंछी को गाते सुना। अँधेरे के पंखों पर शरर-ए -ज़ीस्त को ठहरते देखा। बीते लम्हो का ज़िक्र नहीं था कही भी। ... खुदा की तोहमत नहीं थी कही! ए'तिमाद, रिफ़ाक़त, माज़रत का कही कोई निशाँ [...]

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ज़िन्दगी जाने चले है आज किस राह पर

    ज़िन्दगी जाने चले है आज किस राह पर इन वादियों इन पहाड़ियों की मुस्कुराहट में खोये है आज जैसे  हजारों खुशनुमा अफ़साने मेरे हज़ारो लम्हे जो जिये है हमने साथ में  ए मेरे हमसफ़र  सुबह की रेशमी धूप में समाए  मुझे छेड़ रहें हैं जैसे वक़्त के पिघलते हुए रूह ने हाथ थामा  [...]

तबस्सुम

मिलों तक फ़ैले हुए ये नीली नीली लहरें  पुछे मुझे 'आखों में तेरे तूफ़ान सा क्यूँ है ?' मौन लमहे और भी मौन हो गए  'रुबरू थी मैं एक मौसम के रंगों से' मैंने कहाँ । जैसे कहीं कुछ ठहर सा गया ... 'मौसम के रंगों से तूफ़ान का क्या सरोकार?' लहरों का तबस्सुम बना  [...]